Dr. Prabhakiran Jain

डॉ. प्रभाकिरण जैन

लेखक | संपादक | अनुवादक

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नयी कृतियाँ | Latest Posts

अजय हो

मेरे देश रक्षा हित तेरी रणबांकुरे खड़ेआंधी हो या तूफान हैं फौलाद से अड़ेदुश्मन का इक कदम भी तेरी ओर, गर बढ़ेशिव रूप धर ,दुश्मन

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आंखें।

दहलीज पर ठिठकी गर्व भरी आंखों पर फ़िदा हूं मैं जो गीली हैं गहरे तक पर गर्व से भरी हैं जिनकी कोर पे ठहरे हुए

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मां, तुम रहोगी मेरे साथ

मां!जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ रही हैलगता हैजैसे कि तुम्हारा अक्समुझमें उतरता जा रहा है पूरा का पूरा। कितनी बार मैं वही कहती हूंजो कहती

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पुनः प्रवास के लिए

नहीं मालूमगठरी में सब बांधक्यूं चला आया था मीलों दूर पैदल ही जिसे देखता ,वही समझाताकोरोना आया है, क्या मालूम बचिहो के नाहिअच्छा रहिए कि

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दो चिड़िया

एक पेड़ पर दो चिड़िया हैंपीले पंखों वालीहरी चोंच है, नीली आंखेंउड़ती डाली डाली। सुनो नंदिनी!नई सदी में,रोग नया जो आयाआदम ने खुद न्यौता देकरउसको

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राजनंदिनी आई नानी घर

चुलबुल बुलबुल राजनंदिनीआई नानी घरनाच रहे हैं खेल खिलौनेखुश हो इधर उधर। मुस्का कर नाना को देखेबिन बोले बतियातीनाना की गोदी में चढ़करजाने क्या बतलाती।

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